गढ़वाली भाषा का साहित्य

गढ़वाली भाषा में देवी-देवताओ के जागर, आह्वान गीत, स्तुति, मांगलिक गीतों व तंत्र मन्त्र पीढ़ी दर पीढ़ी याद किये जाते रहे हैं । तंत्र मंत्रों का कुछ हस्तलिखित संग्रह कुछ गाँवो में आज भी मिलता है। प्राचीन अभिलेखों से पता चलता है कि गढ़वाल के राजवंश की राजकीय भाषा "गढ़वाली" थी।

गढ़वाली भाषा का उदय:-

1750 ई० के बाद पत्र-साहित्य, शिलालेख आदि भी गढ़वाली में लिखे जाने लगे। 19 वी सदी में हर्षपुरी, हरिकृष्ण, लीलानंद कोटनाला आदि की कविताएं भी गढ़वाली में ही लिखी हुई मिली।  20वी सदी के प्रारम्भ में गढ़वाली भाषा के प्रति रुझान बढ़ने लगा तथा गढ़वाली में अपनी रूचि रखने वाले लोगों ने "गढ़वाली यूनियन" नाम से एक संगठन बनाया। इस यूनियन का असर यह हुआ कि अन्य जनसामन्य लोगों के भी गढ़वाली भाषा में कविताएं एवं लेख छपने लगे।
शुरूआती दौर में प्रमुख रूप से सत्यशरण रतूड़ी, चंद्रमोहन रतूड़ी, बलदेव प्रसाद शर्मा, तारादत्त गैरोला आदि ने  गढ़वाली में गीत व कविताओं की रचनायें की थी। गद्य के क्षेत्र में भी इस युग में थोड़ा बहुत कार्य हुआ, जिनका श्रेय भवानी दत्त थपलियाल जी, शालिग्राम वैष्णव, गिरिजादत्त नैथानी जी आदि को जाता है।
सन 1930 में आज तक के सभी लिखे हुए गढ़वाली साहित्य से हटकर समाज में विद्यमान कुरीतियों के विरुद्ध लिखना प्रारंभ किया गया इसका श्रेय भजन सिंह "सिंह" को जाता है।
इस दशक में गढ़वाली भाषा को एक नयी ऊर्जा  स्फूर्ति देने का श्रेय:- कमल साहित्यालंकार, विशालमणि शर्मा, सत्यप्रसाद रतूड़ी, ललिता प्रसाद, चंद्र कुंवर बर्त्वाल आदि को जाता है।
स्वतंत्रता की लड़ाई में हमारे गढ़वाली साहित्यकारों ने भी अपने स्वतंत्रता सम्बन्धित लेखों- रचनाओं का प्रकाशन किया। भगवती शरण शर्मा, भगवती प्रसाद पांथरी, घनानन्द घिल्डियाल आदि ने देश में स्वतंत्रता आंदोलन को नयी जाग्रति प्रदान की।

गढ़वाली भाषा: स्वतंत्रता के बाद :-

देश को आज़ादी मिलने के बाद तेज़ी से गढ़वाली भाषा के अस्तित्व को और मजबूती प्रदान करने में त्वरित गति से कार्य किया जाने लगा। गढ़वाली भाषा में "गढ़वाली नाटक, निबंध, गढ़वाली भाषा की व्याकरण, गढ़वाली भाषा का शब्दकोष, मुहावरे-लोकोक्ति कोष आदि के क्षेत्र में तेज़ी से कार्य हुआ।